शादी और दहेज
"बदलाव एक आस"
भाग 3।
*शादी और दहेज*
प्रत्येक समुदाय एवम धर्म मे शादी एक पवित्र बंधन है। शादी को लेकर सभी समुदायों की अपनी परम्परायें और तरीके है। सभी धर्मों में शादी के साथ वर या वधु पक्ष की तरफ से उपहार देने की परंपरा रही है, लेकिन जब ये उपहार जरूरत से ज्यादा हो जाते है या किसी रकम या महंगी वस्तु में तब्दील हो जाते है तो इसे दहेज बोल दिया जाता है। ज्यादातर ये वधु पक्ष की तरफ से वर पक्ष को दिया जाता है हालांकि भारत के कुछ हिस्सों में ये वर पक्ष की तरफ से वधु पक्ष को भी अदा किया जाता है।
भारत में दहेज एक पुरानी प्रथा है । मनुस्मृति मे ऐसा उल्लेख आता है कि माता-कन्या के विवाह के समय दाय भाग के रूप में धन-सम्पत्ति, गउवें आदि कन्या को देकर वर को समर्पित करे ।
यह भाग कितना होना चाहिए, इस बारे में मनु ने उल्लेख नहीं किया और मनु की इसी छोटी सी गलती ने हिन्दू धर्म मे एक बड़ी कुरीति का जन्म ले लिया। इसका असर ये हुआ कि प्राचीन काल राजा महाराजा तथा धनिक लोग अपने बेटियों के शादी में हीरे, जवाहरात, सोना, चाँदी आदि प्रचुर मात्रा में देने लगे और धीरे – धीरे यह प्रथा समाज के सभी वर्गों एवम समुदायों के साथ पुरे विश्व में फैल गई।
दहेज देना एक प्रतिष्ठा का मसला बन गया।
दहेज एक सामाजिक मजबूरी बन गया।
यह कहावत तो अपने सुनी ही होगी कि समाज जिसे ग्रहण कर ले वह दोष भी गुण बन जाता है। और इस तरह दहेज समाज मे दोष से गुण बन गया।
दहेज का एक और भी कारण ये भी है कि भारतीय समाज में नारी को पुरुष कि अपेक्षा निम्न समझा जा रहा है। और समाज ने तय किया कि वो निम्न वस्तु को पूंजी के साथ ग्रहण करेंगे।
दहेज मांगना और देना दोनों निन्दनीय कार्य हैं । जब वर और कन्या दोनों की शिक्षा-दीक्षा एक जैसी है, दोनों रोजगार में लगे हुए हैं, दोनों ही देखने-सुनने में सुन्दर हैं, तो फिर दहेज की मांग क्यों की जाती है ?
दहेज की समस्या पूरे देश मे है लेकिन उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में ये भयावह हालात में है।
दहेज देने और लेने के तरीके हर मामले में अलग होते है लेकिन में यहां कुछ बेहद सामान्य मामलों का जिक्र करना चाहता हूं।
*पहला*
लड़के के परिवार ने दहेज में 15 लाख और सभी सामान की मांग की।
लड़का CISF में सिपाही है। लड़की की योग्यता से कोई मतलब नही।
*दूसरा*
लड़का भारतीय सेना में सिपाही, शादी में 11 लाख दहेज के साथ 2 व्हीकल और सभी सामान भी लिया। लड़की के शिक्षा का स्तर सामान्य।
*तीसरा*
लड़के के परिवार ने कोई मांग नही की, और जो लड़की वालों ने दिया उसको मना नही किया, लेकिन यहां लड़का बेरोजगार है। लड़की भी बेरोजगार।
*चौथा*
लड़का सरकारी अधिकारी है, दहेज में पैसे और किसी भी तरह के महंगे समान के लिए मना किया लेकिन लड़की हो हर दिन काम आने वाले समान को मना नही।
लड़की पोस्ट ग्रेजुएट।
*पाँचवा*
लड़का सरकारी अधिकारी।
शादी में सिर्फ लड़की एक जोड़े के साथ आई। किसी भी तरह के दहेज के लिए स्पष्ट मना किया।
लड़की सरकारी प्रोफेसर।
दहेज लेने और देने के ऐसे हजारों किस्से है लेकिन यहां हमने बेहद सामान्य मामलों को लिया है।
दहेज के हजारों कारण हो सकते है लेक़िन ऊपर दिए गए मामलों से कुछ सामान्य बातें निकल के आती है।
1. दहेज लेना और दहेज देना, दोनो को समाज इज़्ज़त के रूप में देखता है।
2. लोगों को दहेज लेने और देने में कुछ गलत नज़र नही आता, ये एक सामान्य सामाजिक कार्य बन चुका है।
3. लड़की का भविष्य सेफ करने के लिए पिता की मजबूरी।
4. पैसा अहमियत रखता है, और इस लालच में कोई भी इससे मुँह नही मोड़ना चाहता।
5. ज्यादातर ज्यादा दहेज वाले मामलों में लड़की आत्मनिर्भर या पर्याप्त शिक्षित नही होती।( हालांकि इसमें कुछ अपवाद भी है।)
6. युवाओं में उच्च बेरोजगारी दर, जिससे कामकाजी लड़का मिलना बेहद मुश्किल होता है।
7. विकृत सामाजिक ताना बाना, जिसमे लड़की को बोझ ही समझा जाता है।
8. दहेज का सामाजिक दबाव।
9. कुछ धनी परिवारों द्वारा दिखावे के लिए ज्यादा दहेज दिया जाना जिससे उसी समाज मे रहने वाले गरीबो पर दहेज देने का दबाव बनता है।
10. सबसे अहम *विकृत शिक्षा पद्धति*
ऊपर चर्चित मामलों में अगर हम चौथे और पाचवे मामले पे जाए तो पाते है कि लड़के पे परिवार एवम लड़के ने समाज के सामने एक आदर्श स्थापित किया है। नि:संदेह पाचवे मामले में सब कुछ आदर्श रहा है लेकिन व्यक्तिगत तौर पर चर्चा करने पर मुझे 4 नंबर वाले मामले के सर्वाधिक समर्थक मिले।
*इस पर गंभीर रूप से विचार करने पर मैंने खुद महसूस किया कि एक सीमा में प्रतिदिन इस्तेमाल होने वाला समान ज्यादातर मामलों में लड़की के आत्मसम्मान को भी बनाये रखता है, हालांकि इस आत्मसम्मान की भी जरूरत इसे दहेज रूपी सामाजिक कलंक की वजह से ही है।*( इसके बावजूद ये एक गंभीर चर्चा का विषय है और सर्वकालिक परिस्तिथियों में गलत ही सिद्ध होगा, लेकिन वर्तमान हालात में इसे सही माना जा सकता है।)
चौथे और पाचवे मामले समाज के सामने उदाहरण पेश करते है लेकिन जिस गति से दहेज लेने और देने का महिमामंडन होता है इन मामलों का नही हुआ।
मतलब ऐसे गिने चुने मामले घटित होते भी है तो दब जाते है और जो इनके जरिये समाज मे जागरूकता आनी चाहिए वो नही आ पाती है।
समाज मे दहेज ना लेने को गर्व के साथ प्रचारित किया जाना चाहिए एवम इसमें समाचार पत्रों एवम मीडिया के दूसरे माध्यमों को भी अपनी सार्थक भूमिका निभानी चाहिए।
*दहेज एक मानसिकता है* एवम समाज मे दहेज ना लेने को जब तक गर्व के साथ नही लिया जाएगा तब तक इसे बदला नही जा सकता।
सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर उन लोगों का सम्मान होना चाहिए जो दहेज को सिरे से नकारते है।
बदलते वक्त में नजरिया भी बदल रहा है और में ऐसे बहुत सारे युवाओ को जानता हूँ जो शादी में दहेज ना लेने की बात करते है, हालांकि इन्हें परिवार और समाज के जबरदस्त दबाव को सहन करना पड़ता है।
लेकिन इन्ही युवाओ पे आस टिकी है, *उम्मीद है आने वाला कल सुनहरा होगा।*
🙏
*बदलाव एक आस*
मंजीत कुमार।
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