बदलाव एक आस।
*बदलाव एक आस*
में जब भी निजी जिंदगी के आराम से हट कर देश और समाज पर आता हूँ तो परिस्तिथियां मुझे विचलित करती है।
गरीबी, मजबूरी, लचर व्यवस्था, ग़ैरजवाबदार नौकरशाही और मरता आधा अधूरा लोकतंत्र।
अगले पल सोचता हूँ मै कुछ बन जाऊं और इन सब को बदल दूँ।
फिर सोचता हूँ क्या बनूँ ?
में ऐसा क्या करूँ कि इन समस्याओं की जड़ पे प्रहार हो सके।
मैंने सोचा पत्रकार बन जाता हूँ, लोगों कि समस्याएं उठाऊंगा और उससे बदलाव आएगा।
बात एक हद तक सही लगी।
लेकिन कैसा बदलाव होगा वो ?
क्या मेरे द्वारा उठाए गए मुद्दे हमेशा के लिए सुलझा लिए जाएंगे ?
इसे समझने के लिए मैंने पत्रकारिता का इतिहास देखा, आज के अखबारों में उठाये जाने वाले मुद्दे देखे और कुछ मुद्दों का अध्ययन किया।
मिला क्या ?
जो समझ आया वो बेहद निराशाजनक था।
में समझ गया कि खबरे क्षणिक बदलाव लाती है।
और फिर वही पुराना ढर्रा।
कोई भी बदलाव irreversible नही था।
मैंने पत्रकार बनने का विचार त्याग दिया।
लेकिन मन शांत नही था।
फिर मैंने सोचा शिक्षक बनना ठीक रहेगा, एक अच्छी शिक्षा एक अच्छी पीढ़ी का निर्माण करेगी।
और वो पीढ़ी बदलाव लाएगी।
इस विचार ने मुझे उद्देलित किया, इस लिए नही की शिक्षक होना गलत है लेकिन खुद से भाग के किसी और से बदलाव की आस ?
ये विचार मुझे नही जचां, क्योंकि शिक्षक अपनी शिक्षा से कालांतर में बदलाव लाता है।
सड़क किनारे कूड़ा उठाती उस लड़की ने,(जिससे नज़रे मिलाने की हिम्मत मुझमे नही है।) सबसे पहले मुझे ये विचार त्यागने पे मजबूर किया।
इसी तरह बहुत सारे ऑप्शन्स पे मैंने विचार किया जैसे सोशल एक्टिविस्ट हो जाना, सरकारी अफसर बन जाना या फिर खुद पैसे कमा के काबिल बनके गरीबों की मदद कर देना।
फिर मैंने सोचा कि में तय करता हूँ कि में अपना काम ईमानदारी से कर लेता हूँ, और बाकी सबकी चिंता छोड़ता हूँ।(साधनों की कमी एक मुद्दा हो सकता है यहां)
लेकिन अगले ही पल खुद की आत्मा ने मुझे खुदगर्ज़ घोषित कर दिया।
में काबिल हूँ लेकिन मेरे वो भाई जो कष्ट में है, उनका क्या ?
बहुत सोचा।
और में समझ गया कि *आप गलत व्यवस्था में सही काम करके भी कुछ नही बदल सकते।*
समझ आया कि सब समस्याओं की जड़ ये भृष्ट व्यवस्था है।
हमने अपने आधे अधूरे लोकतंत्र (आधा अधूरा इसलिए क्योंकि शक्ति जनता में निहित ना होके कुछ चुने हुए प्रतिनिधियों में है।) में व्यवस्था ही ऐसी बनाई हुई है कि एक ईमानदार और समर्पित आदमी भी अपने अनुसार काम नही कर सकता।
*मतलब व्यवस्था बनाने वाला बनना पड़ेगा।*
मतलब इस व्यवस्था की जड़ पे प्रहार करके इसे उखाड़ना पड़ेगा।
और फिर एक ही रास्ता नज़र आया और साथ मे उस रास्ते पे ढेरो समस्याएं।
सोचा ये समस्याएं मुझे तोड़ देगी, में बर्बाद हो जाऊंगा।
*लेकिन किसी को तो आना पड़ेगा, तो फिर वो में क्यों नही हो सकता ?*
*बदलाव एक आस*
*मंजीत कुमार*
में जब भी निजी जिंदगी के आराम से हट कर देश और समाज पर आता हूँ तो परिस्तिथियां मुझे विचलित करती है।
गरीबी, मजबूरी, लचर व्यवस्था, ग़ैरजवाबदार नौकरशाही और मरता आधा अधूरा लोकतंत्र।
अगले पल सोचता हूँ मै कुछ बन जाऊं और इन सब को बदल दूँ।
फिर सोचता हूँ क्या बनूँ ?
में ऐसा क्या करूँ कि इन समस्याओं की जड़ पे प्रहार हो सके।
मैंने सोचा पत्रकार बन जाता हूँ, लोगों कि समस्याएं उठाऊंगा और उससे बदलाव आएगा।
बात एक हद तक सही लगी।
लेकिन कैसा बदलाव होगा वो ?
क्या मेरे द्वारा उठाए गए मुद्दे हमेशा के लिए सुलझा लिए जाएंगे ?
इसे समझने के लिए मैंने पत्रकारिता का इतिहास देखा, आज के अखबारों में उठाये जाने वाले मुद्दे देखे और कुछ मुद्दों का अध्ययन किया।
मिला क्या ?
जो समझ आया वो बेहद निराशाजनक था।
में समझ गया कि खबरे क्षणिक बदलाव लाती है।
और फिर वही पुराना ढर्रा।
कोई भी बदलाव irreversible नही था।
मैंने पत्रकार बनने का विचार त्याग दिया।
लेकिन मन शांत नही था।
फिर मैंने सोचा शिक्षक बनना ठीक रहेगा, एक अच्छी शिक्षा एक अच्छी पीढ़ी का निर्माण करेगी।
और वो पीढ़ी बदलाव लाएगी।
इस विचार ने मुझे उद्देलित किया, इस लिए नही की शिक्षक होना गलत है लेकिन खुद से भाग के किसी और से बदलाव की आस ?
ये विचार मुझे नही जचां, क्योंकि शिक्षक अपनी शिक्षा से कालांतर में बदलाव लाता है।
सड़क किनारे कूड़ा उठाती उस लड़की ने,(जिससे नज़रे मिलाने की हिम्मत मुझमे नही है।) सबसे पहले मुझे ये विचार त्यागने पे मजबूर किया।
इसी तरह बहुत सारे ऑप्शन्स पे मैंने विचार किया जैसे सोशल एक्टिविस्ट हो जाना, सरकारी अफसर बन जाना या फिर खुद पैसे कमा के काबिल बनके गरीबों की मदद कर देना।
फिर मैंने सोचा कि में तय करता हूँ कि में अपना काम ईमानदारी से कर लेता हूँ, और बाकी सबकी चिंता छोड़ता हूँ।(साधनों की कमी एक मुद्दा हो सकता है यहां)
लेकिन अगले ही पल खुद की आत्मा ने मुझे खुदगर्ज़ घोषित कर दिया।
में काबिल हूँ लेकिन मेरे वो भाई जो कष्ट में है, उनका क्या ?
बहुत सोचा।
और में समझ गया कि *आप गलत व्यवस्था में सही काम करके भी कुछ नही बदल सकते।*
समझ आया कि सब समस्याओं की जड़ ये भृष्ट व्यवस्था है।
हमने अपने आधे अधूरे लोकतंत्र (आधा अधूरा इसलिए क्योंकि शक्ति जनता में निहित ना होके कुछ चुने हुए प्रतिनिधियों में है।) में व्यवस्था ही ऐसी बनाई हुई है कि एक ईमानदार और समर्पित आदमी भी अपने अनुसार काम नही कर सकता।
*मतलब व्यवस्था बनाने वाला बनना पड़ेगा।*
मतलब इस व्यवस्था की जड़ पे प्रहार करके इसे उखाड़ना पड़ेगा।
और फिर एक ही रास्ता नज़र आया और साथ मे उस रास्ते पे ढेरो समस्याएं।
सोचा ये समस्याएं मुझे तोड़ देगी, में बर्बाद हो जाऊंगा।
*लेकिन किसी को तो आना पड़ेगा, तो फिर वो में क्यों नही हो सकता ?*
*बदलाव एक आस*
*मंजीत कुमार*
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