दादाजी और दादीजी
बचपन मे अपने दादाजी के साथ सोना, उनके पैर पकड़ के बैठना, घंटो तक उनके पास खेलना, दादाजी से कहानियां सुनना मेरी आजतक की सबसे बेहतर और कीमती यादें है।
जब भी उनकी याद आती है भावनाओं का ज्वार उमड़ता है।
दादीजी का बताना कि इस तरफ से बादल आने पे बारिश होती है।
बारिश या आंधी से फसल के खराब होने पे दादीजी का रोना और हमारा उनसे लिपटना याद आने पे आज भी रुला देता है।
दादीजी से भूतों की कहानियां सुनना और फिर रात में कमरे से बाहर निकलने में भी डरना जब भी याद आता है चेहरे पे हल्की मुस्कान आ जाती है।
पापा के डांटने पे दादाजी के पास जाना और उनका पापा को डांटना उस वक़्त बहुत सन्तोषकारी होता होता था।
रात में खाना ना खाना और दादाजी से मम्मी की शिकायत करके उन्हीं के पास सो जाना सच मे शानदार होता था।
किसी भी अच्छे काम से पहले दादाजी का पंडितजी को घर बुलाना और हमारा वहाँ बैठ के उनकी बातें सुनना बेहद रोचक था।
दादीजी का भोलेपन से पंडित से पुछना कि फसल कैसी होगी, बारिश कितनी होगी और हमारा भी उन बातों को सच मान लेना।
कितने मासूम थे हम।
काश वैसे ही रहते।
दादीजी 4 सालों तक कहती रही कि मुझे तुम्हारी शादी देखनी है, और में भागदौड़ में लगा रहा। और अभी लगता है जिसे बहुत बड़ी गलती कर दी।
काश 2 वर्ष पहले हाँ कर दी होती तो में कुछ और हसीन पल संजो के रख सकता था।
लेकिन आज भी लगता है जैसे वो हर पल मेरे साथ है।
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