*बदलाव एक आस* में जब भी निजी जिंदगी के आराम से हट कर देश और समाज पर आता हूँ तो परिस्तिथियां मुझे विचलित करती है। गरीबी, मजबूरी, लचर व्यवस्था, ग़ैरजवाबदार नौकरशाही और मरता आधा अधूरा लोकतंत्र। अगले पल सोचता हूँ मै कुछ बन जाऊं और इन सब को बदल दूँ। फिर सोचता हूँ क्या बनूँ ? में ऐसा क्या करूँ कि इन समस्याओं की जड़ पे प्रहार हो सके। मैंने सोचा पत्रकार बन जाता हूँ, लोगों कि समस्याएं उठाऊंगा और उससे बदलाव आएगा। बात एक हद तक सही लगी। लेकिन कैसा बदलाव होगा वो ? क्या मेरे द्वारा उठाए गए मुद्दे हमेशा के लिए सुलझा लिए जाएंगे ? इसे समझने के लिए मैंने पत्रकारिता का इतिहास देखा, आज के अखबारों में उठाये जाने वाले मुद्दे देखे और कुछ मुद्दों का अध्ययन किया। मिला क्या ? जो समझ आया वो बेहद निराशाजनक था। में समझ गया कि खबरे क्षणिक बदलाव लाती है। और फिर वही पुराना ढर्रा। कोई भी बदलाव irreversible नही था। मैंने पत्रकार बनने का विचार त्याग दिया। लेकिन मन शांत नही था। फिर मैंने सोचा शिक्षक बनना ठीक रहेगा, एक अच्छी शिक्षा एक अच्छी पीढ़ी का निर्माण करेगी। और वो पीढ़ी बदलाव लाएगी। ...